पौड़ी और पिथौरागढ़ में वनाग्नि की स्थिति गंभीर, सरकार ने नोडल अधिकारियों को क्षेत्र में भेजा

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देवभूमि उत्तराखंड इन दिनों प्रकृति के दो चरम रूपों वनाग्नि और अतिवृष्टि की दोहरी मार झेल रहा है। जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) के चलते राज्य की पारिस्थितिकी में आ रहे बदलावों ने विशेषज्ञों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। एक ओर जहां सर्दियों में कम बर्फबारी और बारिश के कारण जंगल सूखे की चपेट में आकर सुलग रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मानसून में कम समय में होने वाली 'अतिवृष्टि' (बादल फटना जैसी घटनाएं) तबाही मचा रही हैं। अब तक राज्य की 30 हजार हेक्टेयर से अधिक वन संपदा इन आपदाओं से प्रभावित हो चुकी है।

मुख्य वन संरक्षक सुशांत पटनायक के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग और तापमान में बढ़ोत्तरी वनाग्नि का मुख्य कारण है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 15 फरवरी से 21 अप्रैल 2026 के बीच ही राज्य में आग लगने की 144 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिससे 85 हेक्टेयर जैव विविधता को सीधा नुकसान पहुँचा है। इससे पहले नवंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच नंदा देवी बायोस्फीयर जैसे संरक्षित क्षेत्रों में भी आग पहाड़ियों की चोटियों तक पहुँच गई थी, जिसे बुझाने में सुरक्षाबलों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। पौड़ी गढ़वाल, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिलों को वनाग्नि के लिहाज से 'अति संवेदनशील' श्रेणी में रखा गया है। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत का कहना है कि राज्य में बारिश की प्रवृत्ति खतरनाक तरीके से बदल रही है। अब बारिश धीरे-धीरे होने के बजाय कम समय में बहुत अधिक तीव्रता के साथ हो रही है। जुलाई 2025 में जहां औसत से कम (350.2 एमएम) बारिश हुई, वहीं अगस्त के महीनों में पिछले दो सालों से रिकॉर्ड तोड़ बरसात दर्ज की जा रही है। पिछले साल हर्षिल और धराली में आई आपदा इसी अतिवृष्टि का परिणाम थी। जलवायु परिवर्तन के इस घातक प्रभाव के कारण छेनागाड, ताल जामण, तमकनाला, थराली, चेपड़ों, मोपाटा, पौसारी, बैसानी, थाने, भुजियाघाट, गुदमी और स्यानाचट्टी जैसे दर्जनों स्थान आपदा की मार झेल चुके हैं। भू-वैज्ञानिकों की मानें तो हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ता तापमान न केवल जंगलों को शुष्क कर रहा है, बल्कि बादलों के फटने और अचानक आने वाली बाढ़ (Flash Floods) की घटनाओं को भी ट्रिगर कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस 'क्लाइमेट एक्शन प्लान' पर काम नहीं किया गया, तो उत्तराखंड की बहुमूल्य वन संपदा और हिमालयी बस्तियों पर खतरा और गहरा जाएगा। वर्तमान में वनाग्नि और आपदा प्रबंधन ही सरकार के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है।