पटना। विकास की परिभाषा अमूमन केवल चमचमाती सड़कों, गगनचुंबी पुलों और बड़े अस्पतालों तक ही सीमित मान ली जाती है। लेकिन एक संवेदनशील और जागरूक समाज की असली पहचान इस बात से भी होती है कि वह अपने नागरिकों को इस दुनिया से अंतिम विदाई कितनी गरिमा, आदर और सम्मान के साथ देता है। इसी मानवीय और संवेदनशील सोच को धरातल पर उतारते हुए बिहार सरकार ने राजधानी पटना के ऐतिहासिक बांस घाट पर अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस एशिया के सबसे बड़े हाईटेक शवदाह गृह का निर्माण कराया है। करीब 89.40 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से 4.5 एकड़ क्षेत्र में फैले इस अनूठे परिसर के संचालन और प्रबंधन का जिम्मा अब प्रसिद्ध सामाजिक संस्था 'ईशा फाउंडेशन' को सौंपा गया है।
पटना में गर्मियों के मौसम में पारा अक्सर 45 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है। ऐसे भीषण मौसम में खुले आसमान के नीचे अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार के लिए घंटों इंतजार करना शोकाकुल परिवारों के लिए किसी मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से कम नहीं होता था। इस गंभीर समस्या को दूर करने के लिए पूरे परिसर को वातानुकूलित बनाया गया है। यहाँ पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग सर्वसुविधायुक्त एसी प्रतीक्षालय तैयार किए गए हैं। इसके साथ ही परिसर में बैठने की पर्याप्त और आरामदायक व्यवस्था, स्वच्छ शौचालय, शुद्ध पेयजल, व्यवस्थित पार्किंग, कैंटीन और सुगम इन-आउट गेट्स बनाए गए हैं ताकि दुःख की इस घड़ी में परिजनों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो। इस आधुनिक शवदाह गृह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ लोगों को अपनी धार्मिक आस्था और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार करने की पूरी स्वतंत्रता दी गई है। पर्यावरण के अनुकूल और आधुनिक तकनीक से अंतिम संस्कार के लिए एकमुश्त मात्र 3,500 रुपये का सरकारी शुल्क निर्धारित किया गया है। यदि कोई परिवार सनातन परंपरा के अनुसार लकड़ी से मुखाग्नि देना चाहता है, तो उसे केवल लकड़ी की अतिरिक्त कीमत देनी होगी। कालाबाजारी रोकने के लिए प्रशासन ने रेट तय कर दिए हैं आम की लकड़ी 10 रुपये प्रति किलोग्राम और सखुआ की लकड़ी 20 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से परिसर में ही उपलब्ध कराई जा रही है। गंगा नदी के लगातार बदलते जलस्तर और मानसून की चुनौतियों को देखते हुए शवदाह गृह परिसर के भीतर ही एक सुंदर और पवित्र तालाब का निर्माण किया जा रहा है। यहाँ अंतिम संस्कार की प्रक्रिया संपन्न होने के बाद लोग धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधि-विधान से स्नान कर अनुष्ठानों में शामिल हो सकेंगे। इसके साथ ही वातावरण को शांत, शुद्ध और तनावमुक्त रखने के लिए पूरे 4.5 एकड़ परिसर में बड़े पैमाने पर सघन पौधरोपण कर इसे ग्रीन जोन के रूप में विकसित किया गया है। अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने पहुंचे स्थानीय नागरिक देवेंद्र कुमार भानु ने बताया कि पहले लोगों को कड़कती धूप, बारिश और गर्मी में खुले में खड़ा रहना पड़ता था, जिससे कई लोग बीमार तक हो जाते थे। अब इस सुव्यवस्थित व्यवस्था ने अंतिम विदाई को बेहद सहज बना दिया है। वहीं, एक अन्य नागरिक संजीव कुमार ने कहा कि एसी प्रतीक्षालय और परिसर में बनी कैंटीन जैसी आधुनिक सुविधाओं के कारण शोकाकुल लोगों को इस कठिन समय में बहुत बड़ी मानसिक और शारीरिक राहत मिल रही है। ईशा फाउंडेशन के सदस्य सुनील कुमार ने इसे पटना के लिए एक ऐतिहासिक उपहार बताते हुए कहा कि संस्था के कार्यकर्ता पूर्णतः धार्मिक और सेवा भावना से ओतप्रोत होकर चौबीसों घंटे शोकाकुल परिवारों की सहायता में जुटे रहते हैं। व्यवस्था का पूरा संचालन देख रहे राजीव मिश्रा ने स्पष्ट किया कि यहाँ आने वाले प्रत्येक परिवार को बिना किसी भेदभाव के उत्तम, पारदर्शी और गरिमापूर्ण सुविधाएं उपलब्ध कराना ही उनकी पहली और आखिरी प्राथमिकता है। कुल मिलाकर, बांस घाट की यह महापरियोजना केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि बिहार सरकार की संवेदनशीलता का एक जीवंत प्रतीक बनकर उभरी है।

